राजेश कालिया चंढीगढ
के नए मेयर
बन चुके हैं।लेकिन क्या
आपको उनके संघर्ष
की कहानी के
बारे मे पता
है।आइए जानते हैं
उनकी दिलचस्प कहानी
के बारे मे
जो आपके लिए
प्रेरणादायी साबित हो सकती
है। हम सबको
उनके जीवन से
प्रेरणा लेनी चाहिए ।कि
किस तरह से
एक कूडे बेचने
वाले नगर निगम
के मेयर बन
चुके हैं।

‌‌‌उस वक्त
हम काफी छोटे
थे और मैं
मात्र 16 साल का
था हम
लोग बहुत अधिक
गरीब थे और
घर के अंदर
खाने को एक
पैसा भी नहीं
था। वैसे हम
लोग सुबह ही
कूड़ा बिनने के
लिए निकल जाते
थे और रोज
कुछ कूड़ा बिनकर
30
से
50
रूपये
कमा लाते थे
हालांकि इन
पैसों से गुजारा
नहीं होता था।
लेकिन क्या किया
जा सकता ‌‌‌कुछ
भूखे पेट भी रहना पड़ता था।
‌‌‌बचपन से ही मेरी राजनीति
के अंदर रूचि थी। और इसके लिए मैं राजनिति की खबरे भी सुनता था।
संघर्ष की कहानी राजेश कालिया

‌‌‌एक बार
की बात है
हम कूडा बिन
रहे थे और
यह सुबह का
समय था। एक
घर के पास
खड़े थे और
कुछ लोग आए
और हम से
बोले
अरे तुम यहां
पर क्या कर
रहे हो भाग
जाओ यहां से
?
क्या तुमको पता
नहीं सिर्फ अच्छे
लोग रहते हैं।
तुम जैसे लोगों
की यहां पर
पता नहीं क्यों
जाते हैं
काम तो होता
नहीं है। सुबह
सुबह जाते ‌‌‌ हैं।
‌‌‌उस वक्त
तो मैं उनको
कुछ नहीं कह
सका दिल
को ठेस लगी
कि यार सब
हम लोगों को
ही बुरा क्यों
समझते हैं ? हमने
किसी के घर
से चोरी तो
नहीं कि थी।
उस वक्त यह ‌‌‌समझ मे
नहीं आता था।
क्योंकि वे सब बड़े
लोग थे और
हम छोटे लोग
उनके सामने बोल
भी कैसे सकते
थे
‌‌‌जिंदगी करवट
जब लेती है
तो पता नहीं
चलता है कि
क्या होने वाला
है ? किसी को
पता नहीं होता
है कि अब  क्या हो
सकता है। जो
उपरवाला है उसके पास
किसी भी चीज
की कमी नहीं
है और वह
जब किसी के
उपर मेहरवान होता
है तो उसे
किसी दूसरे की
जरूतर 
नहीं
होती है। और
उसकी मर्जी के
आगे किसी की
नहीं चलती है। ‌‌‌और
शायद वह भी यही चाहता था कि मैं आगे बढूं ।उसने ही मेरे दिमाग के अंदर ऐसे विचार पैदा
किये कि इस कूडा एकत्रित करने मे कुछ नहीं रखा है। यह सब फालतू का काम है। उसके बाद
मैंने धीरे धीरे इस बारे मे सोचना शूरू किया । पहले जब सोचा कि राजनिति के अंदर जाना
है तो यह मेरे लिए काफी मुश्किल था।
‌‌‌लेकिन जब
इंसान सीढियों से
चढ़कर जाता है
तो उसके लिए
छत पर चढ़ना
कोई मुश्किल काम
नहीं होता है।
मैं भी वैसी
ही सीढ़ियों पर
चढ़कर जाने की
सोच रहा था। ‌‌‌और
उसके बाद अपने बनाए प्लान पर विचार करने लगा । सबसे पहले मैंने लोगों से मेलजोल बढ़ाना
शूरू कर दिया । अपने मौहल्ले के लोग तो मुझे अच्छी तरह से जानते ही थे । लेकिन भाई
जो लोगों के दिल से जुड़ता है । उसे कोई खरीद नहीं सकता है। आपने चुनावों के अंदर पैसे
लूटाते देखा है लेकिन ‌‌‌जो प्रत्यासी उनके दिल के अंदर बस चुका है उसे किसी भी चीज
से खरीदना मुश्किल होता है। मैंने भी यही किया और सबसे पहले पार्षद का चुनाव लड़ा और
विजय हो गया । यह मेरी एक शूरूआत थी।
‌‌‌उसके बाद
मैंने अपने पद
पर रहते हुए
अच्छे काम किये
मेरे मोहल्ले वाले
काफी खुश हो
गए किसी
ने सही कहा
है कि
एक अच्छे इंसान की पहचान उसके कर्मों से होती है
वरना तो लोग ips के उपर भी चप्पल उछाल देते हैं
और एक भिखारी के भी पैर छू लेते हैं।
उदाहरण संत कबीरदास
‌‌‌मैंने सोचा नहीं था कि एक दिन कभी चंडीगढ के नगरपालिका की कुर्सी पर मेरे जैसा कचरे बिनने वाला भी बैठ सकता है ? लेकिन अब यह सच हो चुका है। यदि इंसान प्रयास करता है तो फिर उसके लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है।

‌‌‌पिता रह चुके हैं सफाई कर्मचारी


आपको बतादें कि कभी उनके पिता वहां पर सफाई कर्मचारी रहा करते थे और वे अपनी रटायर हो चुके आज राजेश कालिया उस कुर्सी पर बैठे हुए हैं जिस कुर्सी के नीचे उनके समाज के लोग काम करते हैं।
‌‌‌मेरे साथ जिंदगी के अंदर कई बुरे अनुभव भी हुए हैं। लेकिन

जब कोई आपका दिल दुखाए
तो चुप रहना बेहतर है
क्योंकि
जिनको
आप
जवाब  नहीं दे पाते हैं
उनको वक्त जवाब देता है।

‌‌‌यह उन लोगों को वक्त का जवाब है जो सफाई करने वाले कर्मचारियों
को
नीची
निगाहों
से
देखते
हैं
और
उनके
साथ
घ्रणा
करते
हैं।